Ticker

6/recent/ticker-posts

Migration of Bihar || बिहार का पलायन (PART-02)

 





सन… 1912…जब बिहार को एक अलग प्रांत बनाया गया

और फिर…1947… आज़ादी से ठीक पहले तक

इन 35 सालों में

अंग्रेजों नेबिहारऔर वहाँ के लोगों के साथक्या-क्या किया

कैसे

इसके संसाधनों का जमकर शोषण हुआ
समाज को जाति और धर्म के नाम पर तोड़ा गया
किसानों को कर्ज और लगान के बोझ में दबाया गया
और मजदूरों कोअपने ही घर से दूर भेज दिया गया

और कैसेइन सबके बीचएक किसान

धीरे-धीरेमजबूर होता चला गया

एक किसान को

कैसे अपनी जमीन छोड़ने के लिए
मजबूर किया गया

कैसे अपने ही घर से दूर जाने के लिए मजबूर किया गया ……

अब सवाल ये है

1947 में जब देश आज़ाद हुआ

तो क्या बिहार की हालत बदली…?

क्यावो दर्द खत्म हुआ…?या फिर

कहानी ने एक नया मोड़ लिया…?

अब आज़ादी के बाद के बिहार को देखते हैं

 

सन 1947


आज़ादी के बादभारत मेंएक नई सरकार बनी

देश कोअपना नेतृत्व मिला

Indian National Congress की सरकार बनी

औरPandit Jawaharlal Nehru

देश के पहले प्रधानमंत्री बनेवही पार्टी

जिसने आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी

औरबिहार मेंSri Krishna Sinha पहले मुख्यमंत्री बने

ये वो समय थाजब लगाअब सब बदलेगा

अब बिहारएक नई दिशा में आगे बढ़ेगा

लेकिनजब भारत आज़ाद हुआ

तब बिहार की हालतबहुत खराब हो चुकी थी

राज्य बेहद गरीब हो चुका था
ज़मींदारी का दबदबा बहुत बढ़ चुका था
किसानकर्ज़ और शोषण में फंसे हुए थे
उद्योगलगभग ना के बराबर थे
और पलायनपहले से ही शुरू हो चुका था

ऐसे में इतना जल्दी सब ठीक होना बहुत मुश्किल था

ऐसे समय मेंश्री कृष्ण सिंहा के सामनेसबसे बड़ी चुनौती थी

बिहार कोशोषण से निकालकरविकास की राह पर ले जाना

और फिरबदलाव की शुरुआत हुई

सबसे बड़ा कदमLand Reforms Act – 1950

अंग्रेजों के समयजो किसानों की जमीन छीनकरमींदारों को दे दी गई थी

लेकिन अब Land Reforms Act लागू करने के बाद

ज़मींदारी प्रथा को खत्म किया गया
किसानों को उनका हक लौटाया गया
लगान का बोझ कम किया गया

खेती को बेहतर बनाने के लिएनई योजनाएँ शुरू की गईं

कानून व्यवस्था को मजबूत किया गया
ताकि अपराध और जमींदारों का दबाव कम हो सके

सामाजिक न्याय की शुरुआत हुई
पिछड़ी जातियों और दलितों को आगे लाने की कोशिश हुई
सरकारी नौकरियों में उनकी भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया गया

फिरशिक्षा पर काम हुआ

स्कूल और कॉलेजों की संख्या बढ़ाई गई
उच्च शिक्षा को बढ़ावा दिया गया

यहीं सेबिहार में शिक्षा की नींवधीरे-धीरे मजबूत होने लगी

उद्योगों पर भी ध्यान दिया गया

खनिज क्षेत्रोंकोयला, लोहा पर काम हुआ
औद्योगिक विकास की नींव रखी गई

लेकिनविडंबना देखिएआगे चलकर

यही क्षेत्रझारखंड में चले गए


प्रशासनिक सुधार किए गए

नई सरकार की व्यवस्था खड़ी की गई
अंग्रेजों के सिस्टम को बदला गया
पंचायत और स्थानीय प्रशासन को मजबूत करने की शुरुआत हुई

श्री कृष्ण सिंहा नेईमानदारी से

बिहार को संभालने की कोशिश की

लेकिनइतने बड़े नुकसान के बाद

इतनी जल्दीबदलाव आना आसान नहीं था

ज़मीनी स्तर पर असरबहुत धीमा था
गरीबी अब भी बनी हुई थी
रोजगार के अवसरकम थे

औरपलायनअब भीजारी था

अब सवाल ये हैजब शुरुआत इतनी अच्छी थी

तो फिरबिहारआगे क्यों नहीं बढ़ पाया…?

कहाँ हुई गलती…? नीतियों में…? या राजनीति में…?

आइएआगे समझते हैंकि कैसे

1952 से 2000 के बीचबिहार की हालत और बिगड़ती चली गई

और पलायनएक मजबूरी नहींबल्कि एकसिस्टमबन गया

सन 1952

साल… 1952…जब भारत सरकार ने एक नई नीति लागू की

Freight Equalization Policy

पहली नज़र मेंये नीतिदेश के विकास के लिए थी

इसका उद्देश्य थाकि देश के किसी भी हिस्से में

उद्योग लगाना आसान हो जाए

सरकार ने कहाअगर कोई उद्योग

कोयला, लोहा या स्टील जैसे कच्चे माल को दूर से मंगाता है

तो उसके ट्रांसपोर्ट का खर्चसरकार खुद उठाएगी

मतलब

अब फर्क नहीं पड़ता थाफैक्ट्री कहाँ लग रही है

कच्चे माल की लागतहर जगह लगभग बराबर हो गई

लेकिनयहीं सेबिहार की कहानी ने एक खतरनाक मोड़ लिया

क्योंकिउस समय बिहार(और आज का झारखंड)

भारत के सबसे बड़ेखनिज क्षेत्रों में से एक था

कोयलालोहामाइका

सब कुछयहीं मौजूद था

सामान्य स्थिति मेंउद्योगइन्हीं क्षेत्रों के आसपास लगते थे

क्योंकि कच्चा मालयहीं सस्ता और आसानी से मिलता था

लेकिनइस नीति के बाद

उद्योगकहीं भी लग सकते थे

अब

कंपनियों को कोई फर्क नहीं पड़ता थाकि वो बिहार में फैक्ट्री लगाएं

या किसी और राज्य मेंऔर यहींबिहार हार गया

क्योंकिजहाँ दूसरे राज्यों नेइंफ्रास्ट्रक्चर पर काम किया

सड़कबिजलीव्यवस्था सुधारी

वहींबिहारपहले से ही कमजोर था

अंग्रेजों के शोषण से टूटा हुआइसलिए

वो इस रेस में पीछे रह गया

नतीजा ये हुआ कि …?

उद्योगबिहार से बाहर जाने लगे
दूसरे राज्यों में नई फैक्ट्रियाँ लगने लगीं
वहाँ रोजगार बढ़ने लगाऔरबिहार में…?

रोजगार के अवसर कम होते गएगरीबी बढ़ती गई
और लोगकाम की तलाश मेंदूसरे राज्यों की ओर जाते रहे

यहीधीरे-धीरेएक बड़े पैमाने के पलायन में बदल गया


Freight Equalization इस Policy को

1990 के दशक मेंखत्म कर दिया गया

लेकिनतब तक बहुत देर हो चुकी थी

उद्योगदूसरे राज्यों में बस चुके थेऔर बिहार

पीछे छूट चुका था

एक नीतिजिसका उद्देश्य थाबराबरी लाना

वही नीतिबिहार के लिए सबसे बड़ा नुकसान बन गई

और इसी बीचएक और खतरनाक कहानी शुरू हो चुकी थी

1947 के बादअंग्रेज तो चले गएलेकिन

नया प्रशासनअभी मजबूत नहीं था

कानून लागू करने की क्षमता कम थी
सिस्टम कमजोर था

औरयहीं बनीएकखाली जगह”…

और उस खाली जगह कोभर दिया

दबंगों नेमाफियाओं नेऔर ठेकेदारों ने

ये लोगधीरे-धीरेपूरे सिस्टम पर हावी होने लगे

 मजदूरों का शोषण करने लगे
खतरनाक काम करवाने लगे बहुत कम पैसे देने लगे

खदानों की जमीन पर कब्ज़ा करने लगे
बंद खदानों से कोयला चोरी करने लगे
ट्रेनों से चोरी करने लगे
ट्रकों में हेराफेरी करने लगे

सब कुछखुलेआम होने लगा

औरइन सब मेंकुछ लोकल नेता भी शामिल हो गए

सत्तापैसाऔर अपराधएक साथ जुड़ गए

अंग्रेजों ने

बिहार को कमजोर किया थालेकिन

इन माफियाओं और भ्रष्ट सिस्टम नेउसे अंदर से

खोखला कर दिया

संसाधन थेलेकिन लूट लिए गए

लोग थेलेकिन शोषित हो गए

औरआम इंसान के पासफिर से

सिर्फ एक ही रास्ता बचा

पलायन


लेकिनकहानी यहीं खत्म नहीं होती

अब सवाल ये हैजब राजनीतिअपराध से मिलने लगे

तोएक राज्य का क्या होता है…?

कैसे1960 से 2000 के बीच

बिहार

देश का सबसे पिछड़ा राज्य बन गया…?

और कैसे

पलायन
एक मजबूरी नहीं
बल्किज़िंदगी का हिस्साबन गया…?


आइएआगे इस कड़वी सच्चाई को समझते हैं

सन 1960

साल… 1960 का दशक

जब भारतखाद्यान्न की भारी कमी से जूझ रहा था

देश को जरूरत थीएक बड़े बदलाव की

और तभी आई

हरित क्रांति
Green Revolution Scheme…

सरकार नेनई कृषि तकनीकों को लागू किया

हाई-यील्ड बीजरासायनिक खाद
बेहतर सिंचाई व्यवस्थाआधुनिक मशीनें

इन सबने मिलकरभारत की खेती कोपूरी तरह बदल दिया

लेकिनइस क्रांति का सबसे ज्यादा फायदा मिला

पंजाबहरियाणाऔर पश्चिमी उत्तर प्रदेश को

ये इलाकेधीरे-धीरेभारत का अनाज भंडार बन गए

अबजब खेती बढ़ीतोमजदूरों की जरूरत भी बढ़ी

ज्यादा जमीन पर खेती
साल में कई फसलेंकटाई और बुवाई का दबाव

लेकिनएक समस्या थी

इन राज्यों मेंस्थानीय मजदूरइतनी संख्या में नहीं थे

और तभीनजर गईबिहार की तरफ

जहाँगरीबी थीजमीन छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी थी

रोजगार के मौके बहुत कम थे

इसलिएबिहार के लोगमजदूरी के लिएतैयार हो गए

पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिएबिहारी मजदूर

सबसे पहली पसंद बन गए

मेहनती
कम मजदूरी में काम करने वाले
लंबे समय तक काम करने वाले

शुरुआत मेंये पलायनस्थायी नहीं था

लोग कुछ महीनों के लिए जाते थे
खेती के समय काम करते थे
और फिर वापस गांव लौट आते थे

इसे कहा गयाSeasonal Migration

लेकिनधीरे-धीरेयही Seasonal Migration…

Permanent Migration में बदलने लगा


1960 से लेकर… 1980 तकबिहार से मजदूरों का पलायन

तेजी से बढ़ाऔर एक समय ऐसा आया

जबपंजाब के खेतहरियाणा की फसलें

इन सबके पीछेसबसे बड़ा हाथ थाबिहारी मजदूरों का

हरित क्रांति नेपंजाब और हरियाणा को

भारत का अनाज भंडार बना दिया

लेकिन

उसकी असली ताकत थेवो बिहारी मजदूर

जोअपने घर से दूरकम पैसों में

दिन-रात मेहनत कर रहे थे

और इधरबिहार में

श्री कृष्ण सिंहा के बादकई सरकारें आईंकई मुख्यमंत्री बदले

लेकिनजमीन परकोई बड़ा बदलाव नहीं आया

क्योंकि

एक तरफ सुधार की कोशिश हो रही थी
तो दूसरी तरफकरप्शन तेजी से बढ़ रहा था

जनसंख्या बढ़ रही थीबेरोजगारी बढ़ रही थी

औरपलायनअब पूरी रफ्तार पकड़ चुका था

अबबिहार के लिएपलायनसिर्फ एक मजबूरी नहीं रहा

बल्किएकसिस्टमबन चुका था

लेकिनकहानी अभी और खतरनाक होने वाली है

जबराजनीतिअपराधऔर भ्रष्टाचारएक साथ मिलते हैं

तोएक राज्य का क्या हाल होता है…?

कैसे 1980 से 2000 के बीच

बिहारअपराध और भ्रष्टाचार का केंद्र बन गया…?

और कैसेपलायन

अपने सबसे खतरनाक स्तर पर पहुंच गया…?

आइए

अगले चैप्टर मेंइस सच्चाई को समझते हैं


                                                     Plz Continue From Part - 03


Post a Comment

1 Comments